बंगाल में कल मतगणना क्या है उत्तराखंड से कनेक्शन
आदिशक्ति का संबंध: काली से नंदा तक
पश्चिम बंगाल जहाँ मां काली की साधना का केंद्र है, वहीं उत्तराखंड मां नंदा (पार्वती) का मायका है।
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ऐतिहासिक जुड़ाव: बंगाल के महान संत स्वामी विवेकानंद और रामकृष्ण परमहंस की आध्यात्मिक यात्रा उत्तराखंड की गुफाओं (कसार देवी, अल्मोड़ा) के बिना अधूरी मानी जाती है। विवेकानंद ने अल्मोड़ा में साधना की थी और कहा था कि हिमालय की शांति में ही बंगाल की मेधा को पूर्णता मिलती है।
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शक्तिपीठ: बंगाल में ‘कालीघाट’ और ‘तारापीठ’ जैसे सिद्ध स्थान हैं, तो उत्तराखंड में ‘धारी देवी’ और ‘नंदा देवी’ हैं। मान्यता है कि उत्तराखंड के मंदिरों की रक्षा बंगाल के तांत्रिक विद्वान भी करते आए हैं।
2. गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर और रामगढ़ (नैनीताल)
बंगाल की पहचान गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर से है, लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि उन्होंने अपनी अमर रचना ‘गीतांजलि’ के कुछ अंश उत्तराखंड के नैनीताल जिले के रामगढ़ में लिखे थे।
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टैगोर को पहाड़ों से इतना प्रेम था कि उन्होंने वहां अपना घर बनाया था। कल जब बंगाल के सांस्कृतिक गौरव की बात होगी, तो उत्तराखंड की उन पहाड़ियों का जिक्र स्वतः आ जाता है जिन्होंने टैगोर की लेखनी को प्रेरित किया था।
3. आदि गुरु शंकराचार्य और ‘जोशीमठ-बद्रीनाथ’ का बंगाल से नाता
उत्तराखंड के चारों धामों, विशेषकर बद्रीनाथ और केदारनाथ, का बंगाल के तीर्थयात्रियों से सदियों पुराना नाता है।
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धार्मिक कनेक्शन: बंगाल के चैतन्य महाप्रभु ने भी हिमालय की यात्रा की थी। पुराने समय में बंगाल के जमींदार और राजा उत्तराखंड के मंदिरों के जीर्णोद्धार के लिए भारी दान देते थे। केदारनाथ और बद्रीनाथ की यात्रा की परंपरा को बंगाल के लेखकों (जैसे प्रबोध कुमार सान्याल) ने अपनी किताबों के जरिए पूरे देश में फैलाया।
निष्कर्ष: कल का कनेक्शन
कल जब बंगाल में मतगणना होगी, तो कई बंगाली श्रद्धालु जो वर्तमान में केदारनाथ या बद्रीनाथ की यात्रा पर हैं, वे हिमालय की गोद में बैठकर अपने राज्य के भविष्य की प्रार्थना कर रहे होंगे।
राजनीति अपनी जगह है, लेकिन उत्तराखंड ‘मोक्ष’ का द्वार है और बंगाल ‘ज्ञान’ और ‘भक्ति’ का भंडार। कल बंगाल में जीत किसी की भी हो, लेकिन इन दोनों राज्यों का सांस्कृतिक सेतु हमेशा अडिग रहेगा।
एक रोचक तथ्य: पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और भाजपा के कई बड़े नेता अक्सर अपनी आध्यात्मिक शांति के लिए उत्तराखंड के ऋषिकेश और हरिद्वार के आश्रमों में आते रहते हैं।
