रायपुर में सत्ता का नंगा नाच: भाजपा विधायक की दबंगई का खुला प्रदर्शन
संतोष कोठारी की रिपोर्ट……….
रायपुर से सामने आया यह मामला सिर्फ एक झगड़ा नहीं, बल्कि सत्ता के नशे में चूर एक विधायक की गुंडागर्दी का जीता-जागता सबूत है। भाजपा विधायक उमेश शर्मा अपने समर्थकों के साथ प्रारंभिक शिक्षा कार्यालय पहुंचे और वहां अफसरों पर रौब झाड़ते हुए ऐसा तमाशा खड़ा कर दिया, मानो यह कोई सरकारी दफ्तर नहीं बल्कि उनका निजी अखाड़ा हो।
वहां मौजूद निदेशक अजय कुमार नौडियाल ने जब नियम-कानून की बात की और कहा कि स्कूल का नाम बदलने का फैसला शासन स्तर से होगा, तो विधायक की असली करतूत सामने आ गई। वह तिलमिला गए और बात-बात में तकरार बढ़ी और देखते ही देखते उनके समर्थक मारपीट पर उतर आए। कुर्सियां उछाली गईं, सरकारी संपत्ति तोड़ी गई और निर्देशक के सिर पर चोट तक पहुंच गई। महिलाओं को भी नहीं बख्शा गया।
सबसे शर्मनाक बात यह रही कि विधायक जी वहीं बैठे तमाशा देखते रहे, जैसे ये सब उनका “शाही मनोरंजन” हो। न रोक-टोक, न समझाइश बस मौन समर्थन। यह लोकतंत्र नहीं, दबंगई का खुला प्रदर्शन था।
बाद में बयान बदल-बदल कर सच छुपाने की कोशिश और भी ज्यादा घिनौनी है। पहले कहते हैं 4 लोग थे, फिर 6 हो जाते हैं। खुद को पाक-साफ दिखाने के लिए पूरा दोष अधिकारियों पर मढ़ दिया गया। यह साफ दिखाता है कि विधायक खुद को कानून से ऊपर समझने लगे हैं।
यह पहला मामला नहीं है जब इस विधायक का अहंकार और आक्रामकता सामने आई हो। सत्ता मिलते ही अगर कोई जनप्रतिनिधि खुद को राजा समझने लगे और अफसरों को नौकर, तो यह सीधा-सीधा लोकतंत्र का अपमान है। जनता ने वोट सेवा के लिए दिया था, गुंडागर्दी के लिए नहीं।
आज सवाल सिर्फ एक झगड़े का नहीं है—सवाल है सत्ता के दुरुपयोग का, कानून की खुलेआम धज्जियां उड़ाने का, और सरकारी दफ्तरों को डर का अड्डा बनाने का। अगर आज एक अधिकारी बाल-बाल बचा है, तो कल किसी आम नागरिक की जान भी जा सकती थी। इसकी जिम्मेदारी कौन लेगा?
अब अगर पार्टी सिर्फ “सुधारेंगे, बात करेंगे” जैसे घिसे-पिटे बयान देकर मामले को रफा-दफा करती है, तो यह समझ लेना चाहिए कि सत्ता को गुंडागर्दी की खुली छूट मिल चुकी है। ऐसे जनप्रतिनिधियों पर कड़ी कार्रवाई नहीं हुई, तो संदेश साफ जाएगाकि ताकतवर लोग कुछ भी कर सकते हैं और बच निकल सकते हैं।
यह घटना चेतावनी है—या तो राजनीति को साफ किया जाए,
या फिर जनता तय करे कि ऐसे गुंडा प्रवृत्ति वाले नेताओं को कुर्सी पर बैठाने का खामियाजा कब तक भुगतती रहेगी।
