कोटद्वार नाम विवाद कैसे ‘मोहम्मद दीपक’ की वजह से राजनीतिक मुद्दा बन गया
26 जनवरी को कोटद्वार में एक कपड़ों की दुकान के नाम को लेकर शुरू हुआ विवाद धीरे-धीरे तूल पकड़ता चला गया और अंततः यह मामला सामाजिक से अधिक राजनीतिक बन गया। स्थानीय लोगों का मानना है कि यदि “मोहम्मद दीपक” नाम का इस्तेमाल न हुआ होता, तो यह विवाद इतना नहीं बढ़ता।
घटना कोटद्वार की एक कपड़ों की दुकान से जुड़ी है, जहां दुकान के बोर्ड पर “बाबा” लिखा हुआ था। इसी को बजरंग दल के कुछ कार्यकर्ता दुकान पर पहुंचे और नाम बदलने की मांग करने लगे। इस दौरान उन्होंने नारेबाजी शुरू कर दी, जिससे माहौल तनावपूर्ण हो गया।
मौके पर मौजूद 65 वर्षीय दुकानदार वकील अहमद ने हस्तक्षेप करते हुए कार्यकर्ताओं को समझाने का प्रयास किया। उन्होंने कहा कि नाम को लेकर बातचीत से समाधान निकाला जा सकता है और जरूरत पड़ी तो बदलाव भी किया जाएगा। स्थिति धीरे-धीरे शांत हो ही रही थी कि तभी पास में ठेले पर चाय पी रहे दीपक नाम का युवक वहां आ गया।
दीपक ने कार्यकर्ताओं से सवाल किया कि वे कौन हैं और किस अधिकार से नारेबाजी कर रहे हैं। जब कार्यकर्ताओं ने उससे उसकी पहचान पूछी तो दीपक ने अपना नाम “मोहम्मद दीपक” बताया। यहीं से विवाद ने नया मोड़ ले लिया। इसके बाद दीपक, उसके दोस्त विजय रावत और बजरंग दल के कार्यकर्ताओं के बीच तीखी बहस शुरू हो गई। हालांकि इस दौरान कोई गंभीर मारपीट नहीं हुई, केवल धक्का-मुक्की की बात सामने आई।
इसके बाद यह मामला सोशल मीडिया पर तेजी से फैल गया। सोशल मीडिया पर दीपक को एक “हीरो” के रूप में प्रस्तुत किया जाने लगा और बताया गया कि उसने बजरंग दल के कार्यकर्ताओं का डटकर विरोध किया। खुद दीपक ने भी कई इंटरव्यू दिए और यह स्पष्ट करने की कोशिश की कि उसने “मोहम्मद” नाम का इस्तेमाल क्यों किया। देखते ही देखते वह सोशल मीडिया पर वायरल हो गया।
इस वायरल घटनाक्रम से बजरंग दल के कार्यकर्ता और अधिक आक्रोशित हो गए। 31 जनवरी को देहरादून और ऋषिकेश से बड़ी संख्या में बजरंग दल के कार्यकर्ता कोटद्वार पहुंचे और दीपक के जिम के बाहर नारेबाजी की। किसी अप्रिय घटना की आशंका को देखते हुए भारी संख्या में पुलिस बल तैनात किया गया, जिससे स्थिति नियंत्रण में रही।
विवाद उस समय पूरी तरह राजनीतिक हो गया जब कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने इस मामले से जुड़ी एक पोस्ट को सोशल मीडिया पर साझा किया। इसके बाद दीपक लगातार सोशल मीडिया पर सक्रिय रहा और खुद का प्रचार करता रहा। स्थानीय लोगों का कहना है कि इससे कोटद्वार के सामाजिक सौहार्द पर नकारात्मक असर पड़ा।
जब दीपक से इस बारे में सवाल किया गया तो उसने कहा कि वह सभी धर्म को मानता है और हिंदू, सिख, ईसाई सहित सभी धर्मों में उसकी आस्था है। उसके अनुसार, 26 जनवरी को उसने एक बुजुर्ग व्यक्ति को परेशान होते देखा, इसलिए वह खुद को रोक नहीं पाया और विवाद में शामिल हो गया। “मोहम्मद दीपक” नाम पर उसने कहा कि सभी धर्म उसके लिए समान हैं
वहीं, दुकान के मालिक वकील अहमद का कहना है कि इससे पहले भी बजरंग दल के लोग दुकान पर आए थे और नाम बदलने की बात कही थी। उन्होंने बताया कि दुकान के नाम को लेकर पहले ही समाधान निकाल लिया गया था और किसी बड़े विवाद की स्थिति नहीं थी।
स्थानीय लोगों की राय इस मामले में बंटी हुई है। कुछ लोगों का कहना है कि बजरंग दल केवल नारेबाजी कर रहा था और किसी तरह की मारपीट नहीं हुई। वहीं कई लोगों का मानना है कि दीपक के हस्तक्षेप और “मोहम्मद” नाम के इस्तेमाल से विवाद अनावश्यक रूप से बढ़ गया। कुछ स्थानीय नागरिकों ने यह भी आरोप लगाया कि दीपक का झुकाव कांग्रेस की ओर है और उसने जानबूझकर इस मुद्दे को राजनीतिक रंग दिया।
लोगों की प्रतिक्रियाओं से यह साफ़ होता है कि इस पूरे मामले का राजनीतिकरण किया गया। कई लोगों का मानना है कि दीपक चाहें तो अपना वास्तविक नाम बताकर या पुलिस के माध्यम से इस मामले को शांतिपूर्वक सुलझा सकता था, लेकिन उसने इसे सोशल मीडिया और राजनीति का विषय बना दिया।
इस मामले में बजरंग दल से जुड़े तीन कार्यकर्ताओं के खिलाफ पुलिस ने मुकदमा दर्ज किया है। प्रशासन का कहना है कि निष्पक्ष जांच की जा रही है। हालांकि, स्थानीय स्तर पर यह भी माना जा रहा है कि इस पूरे विवाद में गलती केवल एक पक्ष की नहीं है। बजरंग दल की भूमिका पर भी सवाल उठ रहे हैं, लेकिन दीपक की भूमिका को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
ऐसे में यह मामला अब पूरी तरह राजनीतिक रूप ले चुका है और प्रशासन के सामने चुनौती है कि वह सोच-समझकर फैसला ले ताकि क्षेत्र का सामाजिक संतुलन और सौहार्द बना रहे।
