उत्तराखंड की आस्था, परंपरा और सांस्कृतिक विरासत का प्रतीक मानी जाने वाली नंदा देवी राजजात यात्रा स्थगित
उत्तराखंड की आस्था, परंपरा और सांस्कृतिक विरासत का प्रतीक मानी जाने वाली नंदा देवी राजजात यात्रा, जिसे “हिमालयी महाकुंभ” भी कहा जाता है, इस बार स्थगित कर दी गई है। अब यह ऐतिहासिक और धार्मिक यात्रा वर्ष 2027 में आयोजित की जाएगी। इसकी औपचारिक घोषणा 23 जनवरी को मनोती पर्व के दिन किए जाने की तैयारी है। इस निर्णय से श्रद्धालुओं और स्थानीय लोगों में मिश्रित प्रतिक्रियाएँ देखने को मिल रही हैं, लेकिन प्रशासन और धर्माचार्यों का मानना है कि यह फैसला यात्रा की भव्यता, सुरक्षा और बेहतर प्रबंधन को ध्यान में रखते हुए लिया गया है।
नंदा देवी राजजात यात्रा उत्तराखंड की सबसे प्राचीन और महत्वपूर्ण धार्मिक यात्राओं में से एक है। यह यात्रा हर बारह वर्ष में आयोजित होती है और माँ नंदा देवी को उनके मायके से ससुराल भेजने की परंपरा का प्रतीक मानी जाती है। इस दौरान सैकड़ों किलोमीटर लंबा दुर्गम पैदल मार्ग तय किया जाता है, जो न केवल आस्था का मार्ग है बल्कि साहस, संयम और प्रकृति से जुड़ाव का भी प्रतीक है। हिमालय की ऊँची चोटियों, घने जंगलों और दुर्गम घाटियों से गुजरती यह यात्रा लाखों श्रद्धालुओं, साधु-संतों और पर्यटकों को आकर्षित करती है।
बताया जा रहा है कि हाल के वर्षों में प्राकृतिक आपदाओं, बदलते मौसम चक्र और मार्गों की स्थिति को देखते हुए सरकार और यात्रा समिति ने समय बढ़ाने का निर्णय लिया है। इसके अलावा व्यवस्थाओं को और मजबूत करने, ठहरने, स्वास्थ्य, संचार और सुरक्षा के इंतजामों को आधुनिक स्वरूप देने की भी आवश्यकता महसूस की गई है। इसी कारण यह तय किया गया कि यात्रा को 2027 तक स्थगित कर दिया जाए, ताकि सभी तैयारियाँ पूरी गंभीरता और विस्तार से की जा सकें।
23 जनवरी को मनोती पर्व के दिन इस संबंध में औपचारिक घोषणा की जाएगी। मनोती पर्व का विशेष धार्मिक महत्व होता है और इसी दिन से यात्रा की तैयारियों का शुभारंभ भी माना जाता है। परंपरा के अनुसार इसी दिन यात्रा की तिथि, मार्ग और अन्य धार्मिक अनुष्ठानों की रूपरेखा तय की जाती है। इस बार भी श्रद्धालु उसी दिन माँ नंदा देवी से जुड़ी अगली राजजात की आधिकारिक जानकारी प्राप्त करेंगे।
स्थानीय समाज और पुजारियों का मानना है कि राजजात केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि उत्तराखंड की सांस्कृतिक आत्मा का उत्सव है। इस यात्रा से पहाड़ी क्षेत्रों की आर्थिकी को भी बड़ा सहारा मिलता है, क्योंकि लाखों यात्रियों के आगमन से पर्यटन, स्थानीय व्यापार और रोजगार को बढ़ावा मिलता है। ऐसे में यात्रा का स्थगन भले ही कुछ समय के लिए निराशा लेकर आया हो, लेकिन लंबे समय में इससे आयोजन और अधिक सुव्यवस्थित और सुरक्षित हो सकेगा।
सरकार की ओर से यह भी संकेत दिए गए हैं कि 2027 की राजजात को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी पहचान दिलाने के प्रयास किए जाएंगे। इसके लिए डिजिटल रजिस्ट्रेशन, रियल टाइम ट्रैकिंग, आपदा प्रबंधन की उन्नत प्रणाली और पर्यावरण संरक्षण के विशेष उपाय शामिल किए जाएंगे। साथ ही, यात्रा मार्गों के संरक्षण और स्थानीय परंपराओं को जीवंत रखने पर भी विशेष ध्यान दिया जाएगा।
